रविवार, 23 अक्टूबर 2011

आओ दीप जलाएं

 
दीपों का त्यौहार दिवाली , आओ दीप जलाएं .

हर दिल को खुशियाँ बांटें , हर दिल में प्यार जगाएं .

हो आदान - प्रदान मिठाई , सब को दें सौगातें .

मीठी - मीठी याद रखें , बिसरा दें कडवी बातें .

स्वागत करें लक्ष्मी का , वरदान चलो मिल मांगें .

धन दौलत सुख शांति दे माँ , दुःख दरिदर भागें .

कहे 'आज़मी ' मैं चाहू , हर रोज दिवाली आये .

मेहमानों पकवानों संग , फुलझड़ियाँ दीप जलाएं .


सावित्री तिवारी 'आज़मी '

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

औरत




पुरुषों की इस दुनिया में , भगवान बनाई क्यों औरत .
कोमल अंगों -सुन्दरता से , भगवान सजाई क्यों औरत .

दी अग्नि परीक्षा सीता बन , द्रौपदी की गई अर्ध नग्न .
अस्मिता हनन करने को ही , भगवान बनाई क्यों औरत .

क्यों कोख में ही मारी जाती , बच जय तो दुत्कारी जाती .
केवल जिल्लत ही सहने को , भगवान बनाई क्यों औरत .

क्यों पाणिग्रहण जरूरी है , मां बनना क्यों मज़बूरी है .
पालन - पोषण ही करने को , भगवान बनाई क्यों औरत . 

जब औरत दुःख की साथी है , सुख का अमृत बरसाती है .
तब दुःख ही सहने की खातिर , भगवान बनाई क्यों औरत .

सब कहते हैं - है देर नहीं , तेरे घर में अंधेर नहीं .
फिर अंधियारी रातों में ही , भगवान बनाई क्यों औरत .

जब औरत जग की जननी है , माँ -बहन- सुता और घरनी है .
फिर पुरुषों का माध्यम बनकर , भगवान सताई क्यों औरत . 

क्या जतन ' आज़मी ' करे बता , हो गया बहुत ना और  सता .
जब दया नहीं आती है फिर , भगवान बनाई क्यों औरत . 

सावित्री तिवारी ' आज़मी ' 

रविवार, 25 सितंबर 2011

परमार





सुबह - सुबह मेरे आंगन में , एक चिरैया आई 
वह  परमार के जन्म दिवस की , दे कर गई बधाई 

मैं बोली क्या तुझे पता है , कैसे थे यशवंत 
दिखला कर पंखों से करतब , फुर से उडी तुरंत 

जिसने निर्मित किया हिमाचल , पूरा राज्य दिलाया 
जो अस्तित्व हिमाचल का है,  सब है उसकी माया 

उड़ती हूँ बेधड़क यहाँ मैं , चुगती दाना पानी 
नहीं किसी से डरती , करती हूँ अपनी मनमानी  

नदिया , पर्वत , वन और झरने , सब हैं मुझे लुभाते 
मैं जो गीत सुनाती उनको , वही  गीत वे गाते 

आज भी समझा कर  आई हूँ , सब मिलजुल कर आओ 
जन्म दिन परमार का , मिल कर सभी मनाओ 

कहे ' आज़मी ' खूब कहा , तूने  हे चिड़िया रानी 
याद आ गई मुझको , उस नायक की रची कहानी 


सावित्री तिवारी 'आज़मी ' 

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

मुंशी प्रेमचंद


उपन्यास सम्राट का देखा लमही गाँव 
 घर आंगन जर - जर दिखा दिखी न पीपल छांव

दिखी न पीपल छांव मगर बुत बना हुआ था 
चोंच मारते  विहग बीट से सना हुआ था 

पीड़ा  हुई ह्रदय में बरबस मन भर आया 
किसने मुंशी जी का ऐसा हाल बनाया 

और बढे आगे तो देखा गोबर की भरमार 
 ना जाने कितने बसे धनिया जैसी नार 

होरी, झुनिया , सोना , रूपा सब वैसे के वैसे 
 फटेहाल भोला भी देखा किसी के पास ना पैसे 

कफ़न का घीसू खाट बिछाए बीडी  लिए पड़ा था 
 बुधिया तड़प  रही थी माधव अब  तक वंही खड़ा  था 

बूढी  काकी खाने के लालच में आज भी रोती है 
कहाँ निर्मला मन की पीड़ा लिए चैन से सोती है  

कहे ' आज़मी ' सवा सदी की पीड़ा किससे बांटूं 
 काट ना पाए प्रेमचंद उस दुख को कैसे काटूं  

सावित्री तिवारी 'आज़मी ' 

रविवार, 18 सितंबर 2011

शिक्षक




बदल गया परिवेश अब , शिक्षक का भी मान कहाँ 
शिक्षक अब केवल शिक्षक है , अब उसका सम्मान कहाँ 

दर दर रहे भटकता , जीवन भर बदली के चक्कर में 
पूंजी पूरी हो जाती बस,  दूध चाय और शक्कर में
सपने में भी सुविधाओं का ,  मिले उसे सामान कहाँ 
शिक्षक अब केवल शिक्षक है , अब उसका सम्मान कहाँ 

गाड़ी बंगला दूरभाष पर ,  शिक्षक का अधिकार नहीं 
सूट बूट की तरफ देखना , भी उसको दरकार नहीं 
कुर्ता पायजामा और साईकिल , बिन उसका उद्धार कहाँ 
शिक्षक अब केवल शिक्षक है , अब उसका सम्मान कहाँ 

सर्वपल्ली राधाकृष्ण से , ज्ञान जो मिला विरासत में 
उसके ही निर्बहन के खातिर , फंसा हुआ है सांसत में 
सब कहते हैं अब उसमें , ज्ञान का वह  भंडार  कहाँ 
शिक्षक अब केवल शिक्षक है , अब उसका सम्मान कहाँ 

कहे ' आज़मी  ' कोशिश करते  , हैं फिर भी कुछ लोग यहाँ 
ढूंढ़ ढूंढ़ कर लाते हैं  , छिपे हैं गुरुवर जहाँ कहाँ 
बिना उन्हें सम्मान दिए ,  अपना भी है मान कहाँ 
शिक्षक अब केवल शिक्षक है , अब उसका सम्मान कहाँ 

सावित्री  तिवारी ' आज़मी ' 

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

कल रात का सपना

कल रात को सपना देखा फूट फूट के हिंदी रोई
कल ही मेरा जन्म दिवस है फिकर मैं सारी रात ना सोई


मैं बोली फिर रोना कैसा यह तो ख़ुशी का मौका है
हिंदी बोली रहने भी दो पल भर का बस झोंका है


मुझे पता है क्या साजिश है हो हल्ला बस करते हो
अन्दर से तुम हिन्दुस्तानी अंग्रेजी पर मरते हो


अभी उठोगे जैसे ही घर के अन्दर जाओगे
राक डांस पर झूमोगे पाप मैं गाना गाओगे


तुम तो क्या घुरहू कतवारू सब अंग्रेजी बोल रहे हैं
हेलो हाय आई ऍम सारी कह कर पॉयजन घोल रहे हैं


कहे 'आज़मी 'हिंदी जी ये कभी बाज  ना आयेंगें
अंग्रेजी मैं बात करेंगे हिंदी दिवस मनाएंगे

सावित्री तिवारी ' आज़मी '






 


हिंदी की बात

आजाद हिंद में  चलो ये काम हम करें 
हिंदी की बात आज सरेआम हम करें 

हम अपना काम काज  भी हिंदी में करेंगे 
अंग्रेजी भी बोलेंगे पर हिंदी पर  मरेंगे 
इस  मातृभाषा को  चलो प्रणाम हम करें 
हिंदी की बात आज सरेआम हम करें 

हम मिल के बचायेंगे इस हिंदी की शान को 
लगने न देंगें ग्रहण इस मीठी जबान को 
इस हिंदी की बिंदी को भी सलाम हम करें 
हिंदी की बात आज सरेआम हम करें 

हिंदी हमारी राज्यभाषा  राष्ट्रभाषा हो 
हिंदी हमारी बोल चल मातृभाषा हो
इसकी लड़ाई अबसे  खुले आम हम करें 
हिंदी की बात आज सरेआम हम करें 

मिल करके चलो  हिंदी दिवस आज मनाएं 
' आज़मी ' के साथ चलो झूम के गाएं
हिंदी की वंदना ही सुबह शाम हम करें 
हिंदी की बात आज सरेआम हम करें 

सावित्री तिवारी 'आज़मी ' 

स्वागत

हिंदी दिवस की बधाई के साथ हमारे नए ब्लॉग पर आप का स्वागत है ,