गुरुवार, 22 सितंबर 2011

मुंशी प्रेमचंद


उपन्यास सम्राट का देखा लमही गाँव 
 घर आंगन जर - जर दिखा दिखी न पीपल छांव

दिखी न पीपल छांव मगर बुत बना हुआ था 
चोंच मारते  विहग बीट से सना हुआ था 

पीड़ा  हुई ह्रदय में बरबस मन भर आया 
किसने मुंशी जी का ऐसा हाल बनाया 

और बढे आगे तो देखा गोबर की भरमार 
 ना जाने कितने बसे धनिया जैसी नार 

होरी, झुनिया , सोना , रूपा सब वैसे के वैसे 
 फटेहाल भोला भी देखा किसी के पास ना पैसे 

कफ़न का घीसू खाट बिछाए बीडी  लिए पड़ा था 
 बुधिया तड़प  रही थी माधव अब  तक वंही खड़ा  था 

बूढी  काकी खाने के लालच में आज भी रोती है 
कहाँ निर्मला मन की पीड़ा लिए चैन से सोती है  

कहे ' आज़मी ' सवा सदी की पीड़ा किससे बांटूं 
 काट ना पाए प्रेमचंद उस दुख को कैसे काटूं  

सावित्री तिवारी 'आज़मी ' 

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