देखने को अब कोई , सपना नहीं रहा II
धोखा ही थी यह जिंदगी , धोखे में कट गई I
दस्तक से बुढ़ापे की , जवानी पलट गई II
जीने की लत पड़ी है ,तो जीना ही पड़ेगा I
चिरकुट हुई चादर , को भी सीना ही पड़ेगा II
अब ' आज़मी ' की सोच भी , कुछ मंद हो गई I
सारी की सारी अक्ल , कंही बंद हो गई II
सावित्री तिवारी ' आज़मी '
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