धनतेरस
धनतेरस का पर्व है, लगी हुई है सेल।
ठट्ठा मार कुबेर हँसे, लखि धरती का खेल।।
लखि धरती का खेल, मची है आफरा तफरी।
टूट पड़ रहे लोग, बनी है उनकी चकरी।।
कोई सोना ले रहा, कोई मांगे चांदी।
कोई मांगे बढ़िया बर्तन, कोई कपड़ा खादी।।
कहे "आज़मी" सिर्फ देख कर, मैं तो हुई निहाल।
पैसा-पैसा जोड़ कर, कुच्छ लूंगी अगले साल।।
सावित्री तिवारी "आज़मी"
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