मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

जिंदगी



दिल की कहें किससे ,कोई अपना नहीं रहा  I
देखने को अब कोई , सपना नहीं रहा II

धोखा ही थी यह जिंदगी , धोखे में कट गई I
दस्तक से बुढ़ापे की , जवानी पलट गई II

जीने की लत पड़ी है ,तो जीना ही पड़ेगा I
चिरकुट हुई चादर , को भी सीना ही पड़ेगा II  

अब ' आज़मी ' की सोच भी , कुछ मंद हो गई  I
सारी की सारी अक्ल , कंही बंद हो गई II

सावित्री तिवारी  ' आज़मी ' 

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

वेदना


जितनी हुई वेदना तुमको , इस दुनिया में लाने में I
उससे अधिक व्यथित हूँ  , तुमको मंजिल तक पहुचाने में II

लाख किया कोशिश न निकले , एक भी आंसू उस पल में I
अब  तो रहें बरसती आँखें , बिना बात भी पल- पल में II

जन्म की साथी ही बन पाई , यही काम था बस में मेरे  I
अब  तो करे विधाता निर्णय , क्या लिखा है भाग्य में तेरे II

किससे कंहूँ समझ ना आये , कौन करे कुछ हल्की पीड़ा I
किसमें है मानवता इतनी , थाम सके जो तेरी बीड़ा II 

कहे ' आज़मी ' तू भी बन जा , मेरे जैसी हिम्मतवाली I
सहन शक्ति इस कदर बढ़ा ले , फिर कहलाये किस्मतवाली II

सावित्री तिवारी  ' आज़मी '